
*यात्रा संस्मरण – काशी से गंगा के मायके तक*

G R News Network editor in chief Ved prakash Srivastava
*यात्रीगण -* वरिष्ठ साहित्यकार, कवि एवं लेखक सुखमंगल सिंह जी (वाराणसी), कवि इंद्रजीत तिवारी ‘निर्भीक’, अधिवक्ता पवन कुमार सिंह जी, प्रवक्ता बी. डी. वर्मा जी, विजय कुमार गुप्ता जी।
*स्थान – वाराणसी कैंट से हरिद्वार, हरिद्वार से ऋषिकेश, मनसा देवी से अवधूत आश्रम, शंकर चौराहा।*
*दिनांक – सावन का पावन महीना*
कंक्रीट के जंगल की भागम-भाग से कुछ दिन मुक्ति पाने हेतु हम पाँच मित्रों ने तय किया – चलो, जहाँ गंगा का मायका है, वहीं चलते हैं।
*प्रस्थान – वाराणसी कैंट*
रात 10 बजे वाराणसी कैंट स्टेशन से ट्रेन चली। सुखमंगल सिंह जी ने कहा – “काशी विश्व की नाभि है, और हरिद्वार उसकी सास। बेटी को ससुराल भेज कर मायका देखने जा रहे हैं।” सब हँस पड़े। कवि इंद्रजीत तिवारी निर्भीक जी ने तुरंत एक दोहा जड़ा –
_काशी से हरिद्वार तक, गंगा संगम साथ।_
_चल रे मन अब देख ले, मैया का वो घाट।।_
पवन जी एडवोकेट अपनी वकालत वाली डायरी में भी यात्रा नोट कर रहे थे, बी. डी. वर्मा जी प्रवक्ता की तरह हर स्टेशन का इतिहास बता रहे थे, विजय गुप्ता जी सबके लिए चाय-पानी की व्यवस्था में।
सुबह हरिद्वार पहुँचे।
*हरिद्वार – हर की पौड़ी*
हर की पौड़ी पर पहली बार गंगा को देखा तो लगा काशी की गंगा बड़ी होकर यहाँ बच्ची बन गई है – तेज, चंचल, निर्मल। स्नान किया। सुखमंगल जी बोले – “वाराणसी में गंगा मोक्ष देती है, यहाँ गंगा जन्म देती है।”
वहीं से हम कुशा घाट, ब्रह्म कुंड, बिड़ला घाट घूमे। बाजार में कचौड़ी-जलेबी खाई।
फिर रोप-वे से *मनसा देवी दर्शन*। ऊपर चढ़ते ही पूरा हरिद्वार आँखों के सामने – गंगा तीन धाराओं में बँटती हुई। मनसा देवी मंदिर में सबने मन्नत का धागा बाँधा। निर्भीक जी ने कहा – “माँ मनसा, सबकी मनसा पूरी करना, पर कवियों को अहंकार मत देना।”
*हरिद्वार से ऋषिकेश*
ऑटो से ऋषिकेश, मात्र 24 किलोमीटर। रास्ते में राजाजी नेशनल पार्क – जंगल, हिरण, हाथियों के निशान। वर्मा जी बोले – “देखो, यही तो असली भारत है, जहाँ सड़क भी जंगल से परमिशन ले कर गुजरती है।”
ऋषिकेश में – *राम झूला, लक्ष्मण झूला, त्रिवेणी घाट।* गंगा यहाँ और शांत, ध्यानमग्न। त्रिवेणी घाट की आरती देख कर आँख भर आई। हजारों दीये गंगा में बह रहे थे, जैसे काशी की देव दीपावली यहाँ रोज होती हो।
गीता भवन, स्वर्ग आश्रम देखा। वहाँ विदेशी भी संस्कृत बोल रहे थे। पवन जी बोले – “कानून यहाँ फेल है, यहाँ तो सिर्फ आत्मा का कानून चलता है।”
*अंतिम पड़ाव – अवधूत आश्रम, शंकर चौराहा (ऋषिकेश-देहरादून रोड)*
शाम को हम अवधूत आश्रम पहुँचे। शंकर चौराहा के पास शांत, एकांत आश्रम। न कोई शोर, न कंक्रीट का रेला, बस गंगा की कल-कल और मंत्र ध्वनि। आश्रम के महात्मा जी ने हमें तुलसी की चाय पिलाई और कहा – “काशी में ज्ञान मिलता है, हरिद्वार में स्नान और ऋषिकेश में ध्यान।”
सुखमंगल सिंह जी ने अपनी कविता सुनाई – “ब्रज की भोर”। पूरा आश्रम तालियों से गूँज उठा।
रात वहीं विश्राम, सुबह गंगा को प्रणाम कर हम वापस काशी की ओर चले, मन में एक ही भाव लिए –
_हरिद्वार में डुबकी, ऋषिकेश में ध्यान।_
_मनसा माँ के दर पर, झुके सकल जहान।_
_अवधूत आश्रम में मिला, जो काशी में न मिले।_
_मंगल-सुख सब साथ चले, तो तीर्थ स्वयं खिले।।_
यात्रा समाप्त, पर गंगा साथ चल रही है।
लेखक: सुखमंगल सिंह





