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“*राम लखन की ग्राम सोगाईं चंदौली जनपद, यात्रा वृतांत”= डॉ. सुखमंगल सिंह*  _____________&___________ *30 जून 2026, भोर 4:15 से आरंभ* 

 

GRNews Network Brodcast centre editor in chief ved Parkash Srivastava

चंदौली ।भोर के 4 बजकर 15 मिनट हुए थे। अँधेरा अभी पूरी तरह छँटा नहीं था। तभी राम लखन के फोन की घंटी बजी। उधर से बूढ़े मित्र हिम्मती बावरा जी की काँपती आवाज आई। साँय-साँय करते हुए बोले, “भाई, तबीयत ठीक नहीं है। तुम्हारा इंतजार कर रहा हूँ।”

 

राम लखन ने ढाँढस बँधाया, “बाबूजी, घबराइए मत। मैं अनपढ़ से बात कर लेता हूँ। अगर वह तैयार हुआ तो आज ही निकलता हूँ, वरना कल सुबह जरूर पहुँचूँगा।”

 

तुरंत अनपढ़ जी को फोन लगाया। बाबूजी की तबीयत खराब सुनते ही अनपढ़ बोला, “भैया, बस नहा धोकर निकल रहा हूँ। मुगलसराय में मिलते हैं।”

 

इधर राम लखन भी फुर्ती में आ गया। जल्दी से मंजन किया, फ्रेश हुआ, स्नान किया। बैग उठाया। उसमें जरूरी दवाइयाँ रखीं। दाँत में दर्द था इसलिए प्लास्टिक की पाइप रख ली, ताकि पानी उसी से खींचकर पी सके।

 

मोटरसाइकिल की चाबी, कागज और हेलमेट संभाला। निकलने से पहले किराएदार अजनबी को फोन किया, “भैया, चाबी ले लीजिए। मुझे गाँव जाना है। मित्र की तबीयत खराब है।”

 

अजनबी आया। सोमवार शाम की बनी मछली बची थी। मंगलवार होने के कारण अजनबी पति-पत्नी नहीं खाते। वह मछली लाकर राम लखन को दे गया। राम लखन ने खा ली, ताकत जरूरी थी।

 

पेट पूजा के बाद राम लखन चंदौली जिले के सोगाईं गाँव के लिए निकल पड़ा। रास्ते में मुगलसराय रुका। देखा अनपढ़ जी का टेंपो अभी बहुत पीछे है।

 

इंतजार में वह कोलकाता से पेशावर जाने वाली जीटी रोड के नीचे, ओवर ब्रिज की छाँह में बैठ गया। गरमी और चिंता दोनों थी। कुछ ही देर में दूर से टेंपो आता दिखा। अनपढ़ जी आ गए।

 

दोनों मित्रों ने एक दूसरे का हाल पूछा और सोगाईं की आगे की यात्रा की तैयारी करने लगे। बूढ़े हिम्मती बावरा जी का चेहरा दोनों की आँखों के सामने था।

 

कथा का मर्म:

यह यात्रा सिर्फ सोगाईं की नहीं, दोस्ती और फर्ज की है। भोर के फोन ने बता दिया कि रिश्ते खून से नहीं, दर्द बाँटने से बनते हैं। राम लखन अनपढ़ नहीं, दिल का पढ़ा-लिखा निकला।

 

“कोई नहीं जगत में पूरा”

(संत कबीर शैली में साखी-गीत)

 

कोई नहीं जगत में पूरा, सबमें कुछ ना कुछ अधूरा,

चाँद में भी दाग लगे हैं, सूरज में भी धूप कड़वा॥

 

ज्ञानी कहे मैं सब जानूँ, पर मन का हाल न जाने,

धनवान कहे मैं सुखिया, पर नींद रात भर न माने॥

 

साधु बने जो जटा बढ़ाकर, भीतर लोभ की झोली,

राजा बने जो सिंहासन पर, डर से काँपे बोली॥

 

मंदिर-मस्जिद जाने वाले, दिल में मैल पुराना,

माला फेरे लाख करोड़, पर मन न हुआ ठिकाना॥

 

कबीर खड़ा बाजार में, सबकी पोल बताता,

अपने गिरेबान में झाँके, वो ही सच्चा ज्ञाता॥

 

आधा गगरी छलकत जाए, भरी गगरी चुप साधे,

जो पूरा होने का दम भरे, वो सबसे बड़ा आधे॥

 

पानी में मीन प्यासी, सुन-सुन आवत हाँसी,

घट ही में है पूरा साहिब, ढूँढे फिरे उदासी॥

 

कहत कबीर सुनो भाई साधो, पूरा वो ही सोए,

जो अपना अवगुण देखे, और जग का गुण रोए॥

 

ना कोई ऊँचा ना नीचा, सब विधना की माया,

जो अपने को लघु कर जाने, उसने हरि को पाया॥

 

पूरा कहे तो शून्य रहे, शून्य ही पूरण होई,

मिटे जो “मैं-मैं” का फेरा, तो राम न बिसरे कोई॥

 

“मित्र धर्म”

4 पंक्तियों में सार

 

भोर का फोन बना आदेश, नींद उड़ी, दौड़ा दिल,

दोस्ती का कर्ज चुकाने, निकला राम लखन अनिल।

रिश्ता खून से नहीं बनता, दर्द बाँटने से बनता,

मित्र वही जो आधी रात में, बिन बोले सब समझता॥

 

 

आगे की कहानी: सोगाईं पहुँचने तक

 

ओवर ब्रिज के नीचे दोनों मित्र गले मिले। अनपढ़ जी ने टेंपो से पानी की बोतल निकाली, “भैया, मुँह धो लो। धूप चढ़ रही है।” राम लखन ने पाइप से एक घूँट पानी खींचा। दाँत का दर्द टीस मार रहा था, पर हिम्मती बाबूजी का चेहरा सामने था।

 

अनपढ़ ने कहा, “तुम बाइक से आगे चलो, मैं टेंपो से पीछे आता हूँ। गाँव के कच्चे रास्ते में बाइक ठीक रहेगी।” राम लखन ने हेलमेट कसा और चल दिया। मुगलसराय से सैयदराजा, फिर चंदौली पार करते-करते 9 बज गए।

 

धूप अब सिर पर थी। सड़क किनारे नीम की छाँह में दोनों रुके। अनपढ़ झोले से गुड़ और सत्तू निकाला, “खा लो भैया। बाबूजी हमेशा कहते थे, खाली पेट दुश्मन भी कमजोर लगता है, दोस्त तो और कमजोर दिखेगा।” दोनों ने दो घूँट पानी के साथ सत्तू खाया।

 

11 बजे के करीब सोगाईं गाँव की मेड़ दिखी। दूर से ही हिम्मती बावरा जी का ईंट वाला घर दिख रहा था। आँगन में भीड़ थी। राम लखन का कलेजा मुँह को आ गया। बाइक की रफ्तार और बढ़ा दी।

 

दरवाजे पर पहुँचते ही बावरा जी की बेटी दौड़कर आई, “भैया, आप आ गए। बाबूजी सुबह से आपका ही नाम ले रहे थे।” राम लखन बैग से दवा निकालता हुआ भीतर भागा।

 

खाट पर लेटे हिम्मती बाबूजी की आँखें बंद थीं। साँस साँय-साँय चल रही थी। राम लखन ने उनका हाथ थामा। बूढ़ी उँगलियों में हलकी सी हरकत हुई। बाबूजी ने आँख खोली और धीरे से कहा, “आ गया रे लखन… अब चिंता नहीं।”

 

अनपढ़ जी पीछे से आ गए थे। टेंपो की आवाज सुनकर गाँव के दो-चार लोग और जुट गए। राम लखन ने डॉक्टर को फोन लगाया। गाँव की मिट्टी, नीम की हवा और दोस्तों का साथ — तीनों मिलकर हिम्मती बाबूजी की साँसों को थाम रहे थे।

 

शेष आगे.

 

बाबूजी की आँखों में नमी और होंठों पर हलकी मुस्कान देखकर राम लखन समझ गया — समय पर पहुँचना ही सबसे बड़ी दवा थी।

“सोगाईं ग्राम: बावरा जी के आँगन का दृश्य”

दोपहर 1 बजे के बाद, 30 जून 2026

 

करीब 2 घंटे बीत चुके थे। हिम्मती बावरा जी की साँस अब थोड़ी संभली थी। डॉक्टर दवा देकर जा चुके थे। आँगन में थोड़ी शांति हुई तो राम लखन ने बैग खोला। उसमें से उसकी नई प्रकाशित पुस्तक निकली। प्रकाशक ने दो दिन पहले ही भेजी थी। जिल्द पर उसका नाम सुनहरे अक्षरों में चमक रहा था।

 

राम लखन ने चाहा कि इस पल को सहेज ले। बावरा जी खाट पर तकिये के सहारे बैठे थे। बगल में तेज बली अनपढ़ जी खड़े थे। राम लखन ने मोबाइल निकाला और तीनों की एक सेल्फी खींच ली। बावरा जी के चेहरे पर बीमारी के बावजूद हलकी मुस्कान आ गई। बोले, “भाई, तूने तो हमें किताब में अमर कर दिया।”

 

बुढ़ापे में सेवा वही पुरानी कहानी थी। घर में बस बावरा जी की बुजुर्ग पत्नी थी। उसने किसी तरह एक प्लेट में थोड़ा नमकीन, चार बिस्किट, एक लोटे में पानी और दो गिलास लाकर रख दिए। राम लखन और अनपढ़ जी ही दो बाहरी थे, सो उन्हीं के लिए। दोनों ने दो घूँट पानी पिया, बिस्किट तोड़ा।

 

इतने में स्टोव पर चाय चढ़ गई। कुछ ही देर में चार कुल्हड़ में चाय आई। राम लखन, अनपढ़ जी, बावरा जी और उनके साडू जो कई दिन से सेवा में टिके थे, चारों ने चाय की चुस्की ली। 43 डिग्री की खिलती धूप में गरम चाय गले से उतरते ही पसीना और आ गया, पर मन को राहत मिली।

 

राम लखन ने सोचा कि पुस्तक भेंट करते समय की तस्वीर कोई और खींच दे तो बेहतर। बावरा जी की बेटी के दो बच्चे थे, एक बेटा और एक बेटी, करीब 12-14 साल के। उनसे कहा गया, “जाओ बेटा, नीचे से दमयंती दीदी को बुला लाओ, फोटो खींचनी है।”

 

पर आजकल के बच्चे मोबाइल में ऐसे खोए रहते हैं कि कान तक बात पहुँचती ही नहीं। दोनों ने सुनी-अनसुनी कर दी।

 

आखिर बावरा जी खुद लड़खड़ाते हुए उठे। दीवार पकड़कर डगमगाते कदमों से दमयंती को बुलाने चले गए। तब तक राम लखन से रहा न गया। उसने अनपढ़ जी को किताब थमाई, बावरा जी के हाथ में दी, और खुद ही सेल्फी मोड में भेंट की तस्वीर खींच ली। पुस्तक बावरा जी की झोली में रख दी।

 

ठीक तभी दमयंती आँगन में आई और तेज आवाज में बोली, “हाँ, कौन फोटो खींचना है?”

 

बावरा जी चुप रहे। थक गए थे। राम लखन ने धीरे से कहा, “बिटिया, फोटो खिंच गई है। जरा धीरे बोलो। बावरा जी बीमार हैं। और हम लोग 70 किलोमीटर मोटरसाइकिल चलाकर, इस 43 डिग्री की जलती धूप में, सिर्फ इन्हें देखने आए हैं।”

 

दमयंती सकपका गई। नजरें झुकाकर बिना कुछ बोले चली गई।

 

आँगन में फिर सन्नाटा पसर गया। सिर्फ नीम के पत्तों की सरसराहट और बावरा जी की धीमी साँसों की साँय-साँय सुनाई दे रही थी। राम लखन ने बावरा जी का हाथ फिर से थाम लिया। पुस्तक उनके सीने पर रखी थी, और उनकी उँगलियाँ जिल्द को ऐसे सहला रही थीं जैसे पोते का सिर सहलाते हैं।

कथा का मोड़: सेवा में कमी थी, पर भाव में नहीं। पुस्तक मिली, तस्वीर हुई, और एक पीढ़ी ने दूसरी पीढ़ी को चुपचाप बहुत कुछ सिखा दिया।

 

“दोपहर 12:15 : सोगाईं ग्राम से विदाई का समय”

 

घड़ी में 12 बजकर 15 मिनट हुए थे। धूप सिर पर आग बरसा रही थी। राम लखन और अनपढ़ जी ने बावरा जी के घर से चलने की तैयारी की। अनपढ़ को चकिया से 6 किलोमीटर दूर अपने गाँव जाना था, पर आज चकिया में 12 बजे से कवि सम्मेलन भी शुरू हो चुका था। मन कसमसाहट में था — पहले गाँव जाएँ या सीधे सम्मेलन में।

 

दोनों ने हेलमेट उठाया। तभी ऊपर कमरे से आवाज आई। बावरा जी लड़खड़ाते हुए सीढ़ी से उतर रहे थे। एक-एक पायदान पर रुकते, दीवार थामते, साँस भरते। राम लखन और अनपढ़ दौड़कर रोकने लगे, “बाबूजी, आप रहने दीजिए। आपकी तबीयत ठीक नहीं। कहीं गिर गए तो? हम खुद चले जाएँगे।”

 

पर बावरा जी मुस्कुराए। बोले, “भाई, यही संस्कार है। मेहमान को दरवाजे तक छोड़ना होता है।” जूता पहनकर, दीवार पकड़कर, किसी तरह ड्योढ़ी तक आए। धूप में उनका कुर्ता पसीने से भीग गया था।

 

दरवाजे पर प्रणाम-आशीर्वाद हुआ। अनपढ़ जी ने झुककर बावरा जी के पाँव छुए। फिर आदतन राम लखन के भी पाँव छूने को झुके, पर राम लखन ने कंधा पकड़कर उठा लिया, “अरे भाई, बावरा जी से विदा ले रहे हैं, चलो।”

 

गाँव की सकरी गली शुरू हुई। करीब 5 फीट चौड़ी, दोनों ओर घर। आधा किलोमीटर चलने के बाद नहर मिली। नहर की पटरी पकड़कर सैयदराजा की ओर रास्ता जाता था। धूप में पटरी तवे सी तप रही थी।

 

गाँव से बाहर निकलते ही एक पान की गुमटी दिखी। एक किलोमीटर बाद दूसरी गुमटी। राम लखन ने बाइक रोकी। “चलो भाई, मुँह का जायका बदल लें।” दो पान लगवाए और एक पाँच रुपए वाला बिस्किट लिया। अनपढ़ जी को चाय की तलब लगी। पाँच रुपए की कॉफी ले ली।

 

राम लखन ने जेब से 100 का नोट दुकानदार को दिया। गुमटी पर चार-पाँच लोग पहले से बैठे थे। गर्मी से बचने को सब वहीं सुस्ता रहे थे। नए लोगों को देखकर बातचीत शुरू हुई, “कहाँ से आना हुआ भैया?”

 

जब पता चला कि राम लखन अयोध्या से आए हैं और अनपढ़ जी चकिया से, तो सबकी आँखें चमक गईं। एक बुजुर्ग बोले, “अरे, आप तो कवि लोग हैं। हमने नाम सुना है।”

 

खुलासा होने पर सम्मान दोगुना हो गया। दुकानदार ने बचे पैसे लौटाते हुए कहा, “कवि जी, फिर आइएगा।” चलते समय गुमटी पर बैठे सभी लोग खड़े हो गए। हाथ जोड़कर बोले, “कवि जी प्रणाम।”

 

राम लखन और अनपढ़ ने सिर झुकाकर प्रणाम लिया। बाइक स्टार्ट की। एक तरफ सैयदराजा का रास्ता, दूसरी तरफ चकिया का कवि सम्मेलन। मन में बावरा जी का लड़खड़ाता हुआ चेहरा और गुमटी वालों का “कवि जी प्रणाम” गूँज रहा था।

 

43 डिग्री की धूप में भी संस्कार की छाँह ठंडी लग रही थी।

“दोपहर का सफर: मुगलसराय से पहले का पड़ाव”

30 जून 2026, दोपहर

 

राम लखन सिर पर हेलमेट कसे हीरो होंडा स्प्लेंडर चला रहे थे। धूप ऐसी कि डामर पिघल रहा था। बीच में दो जगह रुके। बैग से तांबे की बोतल निकाली। उसमें नींबू रस वाला पानी था। पाइप से घूँट-घूँट पिया, पर गरमी थी कि जान निकाल रही थी।

 

पंडित दीनदयाल उपाध्याय नगर यानी मुगलसराय से कोई 5 किलोमीटर पहले अचानक सीने में भारीपन लगा। घबराहट बढ़ी। हाथ काँपने लगे। राम लखन ने तुरंत बाइक किनारे लगाई और सर्विस लेन पर बैठ गए।

 

कुछ देर सुस्ताने पर भी राहत नहीं मिली। तब एक रिश्तेदार को फोन लगाया। ये वही रिश्तेदार थे जो राम लखन के साले लगते थे। जब तक साले साहब जीवित थे, नौकरी दिक्कत से लेकर इलाज तक हर जगह राम लखन ने दौड़-धूप कर मदद की थी। अब साले साहब नहीं रहे। उनकी पत्नी तारा जी हैं। बच्चे नहीं थे । घर में बहूँ ही एक बहू!

 

फोन तारा ने उठाया। राम लखन ने कहा, “भाभी, मैं सैयदराजा और मुगलसराय के बीच में हूँ। धूप बहुत है। 43 डिग्री तापमान सहा नहीं जा रहा। एक घंटा आपके यहाँ रुक जाऊँ?”

 

उधर से जवाब आया, “लाइन नहीं है। एसी चल रहा है उसी में मैं और छोटी बहू रह रहे हैं। बहुत दिक्कत है।”

 

राम लखन ने धीरे से कहा, “तुम्हारे तीनों बच्चे अच्छी नौकरी में हैं। एक बैटरी और लगवा लो। या पुरानी बैटरी में ही पानी डाल दो।” पर मन में टीस उठी। इतना कहने पर भी तारा ने एक बार नहीं कहा कि भाई साहब, आ जाइए। एक-दो घंटे रुक लीजिए।

 

राम लखन ने अपनी तबीयत खराब होने की बात नहीं बताई थी। सिर्फ धूप की बात कही थी। फिर भी रिश्तों का सच सामने आ गया। लगा जैसे सारे किए-धरे पर किसी ने पानी फेर दिया।

 

तब तक अनपढ़ जी भागकर आए। बगल में एक मकान था। बहुत आलीशान नहीं, पर साफ-सुथरा। बाहर कदम के पेड़ के नीचे एक चारपाई पड़ी थी। उस पर बिस्तर बिछा था। बगल में गाय बँधी थी। अनपढ़ ने सहारा देकर राम लखन को वहीं लिटा दिया।

 

कमाल की बात थी। घर में से जो भी निकला — बहू, बेटी या कोई पुरुष — किसी ने नहीं कहा कि चारपाई से उठ जाओ। अनजान मुसाफिर को छाँह दे देना ही उस घर के संस्कार थे।

 

राम लखन एक घंटा लेटा रहा। अंदर ही अंदर सीने में दर्द, घबराहट। कब आँख लग गई पता नहीं। ढाई बजे अनपढ़ ने धीरे से हिलाया, “बाबूजी, उठिए। तबीयत ठीक हो तो चलें?”

 

राम लखन उठ बैठे। बोले, “भाई, तुम्हारा कवि सम्मेलन मेरी वजह से छूट गया। इसका दुख है। पर क्या करूँ? स्वास्थ्य अपने हाथ में नहीं। ऊपर वाला जाने। हाँ, ऐसी घटना मेरे साथ 6-7 बार हो चुकी है।”

 

तांबे की बोतल से पानी पिया। धीरे-धीरे हिम्मत जुटाकर मुगलसराय पहुँचे। वहाँ चाय की दुकान पर रुके। अनपढ़ को डेढ़ सौ रुपए दिए, “आने-जाने का भाड़ा और बच्चों के लिए टॉफी बिस्किट ले लेना।”

 

दोनों ने 20-20 रुपए वाली छोटी स्प्राइट पी। कुछ देर बाद अनपढ़ को टेंपो मिल गया। वह “प्रणाम बाबूजी” कहकर चकिया के लिए रवाना हो गया।

 

राम लखन अकेले रह गए। चाय की दुकान पर पाँच मिनट आँख बंद कर बैठे। फिर लंबी साँस ली। हेलमेट पहना। मोटरसाइकिल में चाबी लगाई और धीरे-धीरे बनारस की तरफ बढ़ चले।

 

पीछे छूट गया बावरा जी का आशीर्वाद, अनपढ़ की दोस्ती, गुमटी वालों का प्रणाम, और एक अनजान घर की चारपाई का साया। साथ चल रहा था बस सीने का दर्द और रिश्तों का खारा सच।

 

कथा का सबक: – धूप में छाँह देने वाले अक्सर खून के रिश्ते नहीं होते। और जिन्हें हम अपना समझकर तपती दुपहरी में आस लगाते हैं, उनके घर का एसी कभी-कभी दिल से ज्यादा ठंडा निकलता है।

 

“मुक्तक: तपती दोपहरी का सच”

 

तपती दुपहरी में जब साँस उखड़ने लगी,

खून के रिश्ते ने घर की कुंडी जड़ दी।

अनजान आँगन की चारपाई बाँह पसारे खड़ी थी,

संस्कार वही जो बिना पूछे छाँह कर दी॥

 

“शाम ढलने पर: पांडेपुर का फ्लैट, बनारस”

30 जून 2026, शाम 4 बजे के बाद

 

राम लखन का फ्लैट सन 1990 से पांडेपुर में है। धीरे-धीरे स्प्लेंडर चलाते हुए वह बनारस पहुँचे। आवास विकास गेट से ठीक पहले एक चाय की दुकान पर रुके। एक कप चाय गले से उतारी। शरीर में जान नहीं थी, पर घर पहुँचने की आस थी।

 

फ्लैट की चाबी किराएदार के पास थी। फ्लैट तक पहुँचे तो सीढ़ी पर ही बैठ गए। हिम्मत जवाब दे चुकी थी। फोन मिलाया। किराएदार की पत्नी मनोरमा आई। बोली, “बाबूजी, थोड़ा बगल हो जाइए।” राम लखन रेलिंग पकड़कर किसी तरह खड़े हुए। जान निकल रही थी।

 

मनोरमा ने दरवाजा खोला, बत्ती जलाई। राम लखन ने कहा, “बेटी, पंखा भी चला दो।” अंदर आकर सोफा-टेबल के बगल में रखी तख्त पर ही ढह गए। पानी पीने की हिम्मत नहीं हुई। मनोरमा काम निपटाकर चली गई।

 

कुछ देर में कमजोरी और बढ़ गई। जाली का दरवाजा खुला था। सामने पड़ोसन अपने बच्चों के कपड़े समेट रही थी। राम लखन ने सोचा कि आवाज देकर बुलाएँ। टेबल पर इलेक्ट्रॉल का पैकेट रखा था। सोचा कि घोलकर पिला दे। पर जुबान से बोल नहीं फूटा। सीने का दर्द और घबराहट ने आवाज दबा दी। पड़ोसन को बुला नहीं पाए।

 

फिर हिम्मत करके मनोरमा को फोन किया। मनोरमा ने फोन उठाया। राम लखन बोले, “बेटी, अपने पति को भेज दो। किचन से एक गिलास और चम्मच ले आएँ। सामने आरो का 20 लीटर वाला डिब्बा रखा है। उससे पानी लेकर इलेक्ट्रॉल घोलकर दे दें।”

 

परंतु मनोरमा खुद ही आ गई। किचन से गिलास चम्मच लाई। इलेक्ट्रॉल घोला। पहला घूँट बहुत गाढ़ा और मीठा लगा। राम लखन ने कहा, “बेटी, और पानी मिला दो।” दो गिलास इलेक्ट्रॉल पानी पीकर कुछ जान आई।

 

मनोरमा जाने लगी तो बोली, “बाबूजी, इनके(पति ) सिर में कई दिन से बहुत दर्द है।” राम लखन ने बैग से गैस की 10 टैबलेट निकालीं। “ये लो। खाना खाने के आधा घंटा पहले देना। कल से सुबह खाली पेट खाना है।”

 

15-20 मिनट बाद तबीयत कुछ संभली तो राम लखन ने फिर फोन किया। मनोरमा ने उठाया। पूछा, “तेरे पति की तबीयत कैसी है अब?” मनोरमा बोली, “सिर दर्द बहुत है बाबूजी।” राम लखन ने कहा, “बर्फ से माथे की सिकाई करो। हो सकता है बीपी बढ़ गया हो।”

 

राम लखन की पत्नी बेटी के पास रहती हैं। इसलिए मनोरमा ही खाना बनाकर देती रही। पूछा, “बाबूजी, क्या बना दें? हम लोग तो पूरी सब्जी खाएँगे।” राम लखन बोले, “किचन में मूँग की दाल रखी है। उसे ले जाओ। बहुत पतली सी सादी खिचड़ी बना देना। छौंक मत लगाना।”

 

मनोरमा बोली, “छौंक लगा दूँ?” राम लखन ने मना किया, “नहीं बेटी। मेरे पास देसी घी रखा है। सादी खिचड़ी ले आना। मैं थोड़ा घी डालकर खा लूँगा।”

 

रात 9 बजे मनोरमा एक बड़ी कटोरी में पतली खिचड़ी ले आई। राम लखन ने उसमें चम्मच भर देसी घी मिलाया। दो-चार कौर खाए। दवा ली। फिर तख्त पर लेट गए।

 

बाहर बनारस की रात उतर रही थी। पंखा चल रहा था। शरीर टूटा हुआ था, पर मन में एक बात साफ थी। आज जिनसे आस थी उन्होंने दरवाजा नहीं खोला, और जिसने दरवाजा खोला उससे कोई खून का रिश्ता नहीं था।

 

बकथा का अंत नहीं, पड़ाव है:- 43 डिग्री की धूप, 70 किलोमीटर का सफर, रिश्तों की बेरुखी और एक किराएदार की हमदर्दी। राम लखन ने आँख बंद की। बावरा जी का लड़खड़ाता चेहरा याद आया। यही संस्कार है, यही मित्र धर्म है।

 

अगली सुबह राम लखन की तबीयत कैसी रही, और बावरा जी को फोन किया या नहीं ?

 

“अगली सुबह: 1 जुलाई 2026, पांडेपुर का फ्लैट”

 

रात भर राम लखन को चैन नहीं मिला। रात से ही दो-तीन बार दस्त हुए। पानी जैसे पतले दस्त। एक बार तो नींद में ही चड्डी खराब हो गई। हड़बड़ाकर उठे। बाथरूम में जाकर उसे धोया। हाथ-पैर धोए। थककर फिर तख्त पर आ गिरे।

 

रात 1:30 बजे फिर नींद टूटी। पेट में मरोड़ उठ रही थी। लोटे से पानी पिया। करवट बदलकर सोने की कोशिश की। 3:00 बजे फिर उठ गए। आँखों में नींद नहीं, शरीर में जान नहीं।

 

आखिर 5:00 बजे भोर में राम लखन उठ बैठे। 70 साल की उम्र में शरीर अब पहले जैसा जवाब नहीं देता। धीरे-धीरे उठकर रसोई में गए। पानी गरम किया। पहले एक गिलास गुनगुना पानी पिया। फिर चाय बनाई। उसी चाय में देसी घी की दो-चार बूँदें डालकर सुड़का। बूढ़ी हड्डियों को घी वाली चाय से कुछ ताकत मिली।

 

पर थोड़ी देर में पेट फिर गड़बड़ा गया। भागकर बाथरूम गए। लुंगी खराब हो गई। फिर उसे धोना पड़ा। कमजोरी से हाथ काँप रहे थे। तख्त पर आकर लेट गए। पंखे की हवा भी गरम लग रही थी।

 

मन हुआ कि बावरा जी को फोन करें। हाल पूछें। बावरा जी 78 साल के हैं। उम्र में 8 साल बड़े। रिश्ते में भी बड़े। पहले राम लखन को ही फोन करना चाहिए। यही शिष्टाचार है।

 

पर शरीर साथ नहीं दे रहा था। सोचा, तबीयत थोड़ा सामान्य हो जाए, आवाज में दम आ जाए, तब बात करेंगे। कहीं ऐसा न हो कि फोन पर आवाज काँपे और बावरा जी उल्टे परेशान हो जाएँ।

 

तख्त पर लेटे-लेटे राम लखन ने छत को देखा। कल की पूरी फिल्म आँखों के सामने घूम गई। 43 डिग्री की धूप। 70 किलोमीटर का सफर। तारा भाभी की बेरुखी। अनजान घर की चारपाई। मनोरमा की खिचड़ी।

 

बुढ़ापा शरीर को तोड़ता है, पर रिश्तों की परख भी करा देता है। बावरा जी लड़खड़ाते हुए दरवाजे तक छोड़ने आए थे। और यहाँ खून के रिश्ते ने एक घंटे की छाँह देने से मना कर दिया।

 

राम लखन ने आँख बंद कर ली। तय किया कि दोपहर तक आराम करेंगे। इलेक्ट्रॉल पिएँगे। फिर शाम को हिम्मत करके बावरा जी को फोन लगाएँगे। पहले उनका हाल पूछेंगे, फिर अपना बताएँगे।

 

“कल का सफर शरीर पर भारी पड़ा था, पर मन पर एक बात साफ लिख गया था”: उम्र 70 की हो या 78 की, मित्र वही जो आखिरी साँस तक दरवाजे पर छोड़ने आए। और रिश्ता वही जो बिना कहे पानी का गिलास थमा दे।

 

दोपहर में मनोरमा फिर खाने का पूछने आई तो राम लखन ने धीरे से कहा, “बेटी, आज भी पतली खिचड़ी ही बना देना। और हाँ, तेरे पति के सिर दर्द का क्या हाल है?”

 

जिंदगी इसी तरह चल रही थी — एक तरफ दस्त और कमजोरी, दूसरी तरफ मनोरमा की हमदर्दी और बावरा जी की चिंता।

 

“2 जुलाई 2026: पांडेपुर का फ्लैट, हाल बेहाल”

 

2 तारीख को भी राम लखन की तबीयत नहीं संभली। रात 1:30 बजे से सुबह तक चार बार दस्त हुए। पानी सा शरीर निकल रहा था। कमजोरी ऐसी कि बिस्तर से उठना पहाड़ लग रहा था। 70 साल की देह अब बार-बार धोखा दे रही थी।

 

पर मन नहीं माना। काँपते हाथों से फोन उठाया। सबसे पहले बावरा जी को लगाया। घंटी गई। उधर से कमजोर सी आवाज आई, “कौन, राम लखन?” राम लखन ने गला साफ किया, “हाँ बाबूजी, प्रणाम। तबीयत कैसी है अब आपकी?” बावरा जी बोले, “भाई साहब, तुमसे मिलकर जान आ गई थी। अब ठीक हूँ। तुम सुनाओ, आवाजजी क्यों बैठी है?” राम लखन ने बात टाल दी, “बस गरमी लग गई थी। आप अपना ख्याल रखिए।”

फिर तेज बली अनपढ़ जी को फोन किया। अनपढ़ जी की आवाज भी परेशान थी। बोले, “बाबूजी, प्रणाम। घर में अनर्थ हो गया। पत्नी को एक्सीडेंट में सर में चोट लग गई है। खून बहुत बहा।” राम लखन चौंक गए, “अरे! कहाँ दिखा रहे हो?” अनपढ़ बोला, “सोच रहे हैं चंदौली ले जाएँ। गाँव में तो झोलाछाप ही हैं। रिसाव हो रहा है।”

राम लखन ने हिम्मत जुटाकर कहा, “भाई, तुरंत चकिया के सरकारी अस्पताल ले जाओ। वहाँ अच्छे पढ़े-लिखे डॉक्टर होते हैं। और इस समय योगी सरकार में दवा भी सही ढंग से मिलती है। चंदौली भागने की जरूरत नहीं। पहले सरकारी में दिखाओ।”

अनपढ़ ने पूछा, “बाबूजी, आप कैसे हैं? कल से आवाज नहीं आई।” राम लखन ने लंबी साँस ली। बोले, “भाई, अपनी क्या बताएँ। 1 तारीख से दस्त नहीं रुक रहे। रात भर में चार बार हो गया। शरीर टूट गया है। पर सब ऊपर वाले की कृपा है। क्या किया जाएगा। तुम पहले पत्नी को संभालो।”

फोन रखकर राम लखन फिर तख्त पर लेट गए। एक तरफ अपनी देह जवाब दे रही थी, दूसरी तरफ अनपढ़ की पत्नी के सिर से खून बह रहा था। बावरा जी 78 के होकर भी हिम्मत बाँधे थे।

 

दोपहर को मनोरमा खिचड़ी लेकर आई। राम लखन ने दो कौर खाए और फिर लेट गए। मन में एक ही बात थी। 43 डिग्री की धूप में रिश्ते तपकर खरे-खोटे हो गए। कोई एसी में छाँह नहीं देता, कोई बिना रिश्ते के खिचड़ी पकाकर दे देता है। कोई सरकारी अस्पताल से भागता है, कोई उसी में भरोसा करने को कहता है।

 

कथा का सूत्र: -बुढ़ापा, बीमारी और एक्सीडेंट तीनों एक साथ टूट पड़ते हैं। पर इंसानियत तब भी किसी मनोरमा, किसी अनपढ़, किसी बावरा जी के रूप में खड़ी मिल जाती है। राम लखन ने आँख बंद की और ऊपर वाले से सबके लिए दुआ माँगी। पहले अनपढ़ की पत्नी के लिए, फिर बावरा जी के लिए, और सबसे आखिर में अपने लिए।

 

– सुख मंगल सिंह

वरिष्ठ साहित्यकार कवि एवं लेखक वाराणसी वासी, अवध निवासी, अंबेडकर नगर जनपद, उत्तर प्रदेश, भारत

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