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*जब कलम स्कूटर पर सवार होकर कश्मीर निकली*   **1994 में साहित्यकार सुखमंगल सिंह की ‘काशी से कश्मीर तक सद्भावना यात्रा’ की अनकही दास्तान*_

 

*GRnews network Brodcast centre*  editor in chief ved Parkash Srivastava

वाराणसी।सन 1994। कश्मीर घाटी बारूद के ढेर पर बैठी थी और पंजाब अभी-अभी आतंकवाद के साये से बाहर निकला था। टीवी पर हर शाम बम धमाकों और कर्फ्यू की खबरें आती थीं। ठीक उसी दौर में वाराणसी के वरिष्ठ साहित्यकार, कवि एवं लेखक सुखमंगल सिंह ने एक अनोखा संकल्प लिया— “काशी से कश्मीर तक सद्भावना यात्रा”। न कोई राजनीतिक बैनर, न सुरक्षा घेरा। साथ था सिर्फ एक पुराना स्कूटर, साथी कुमार हेमंत, और झोले में भरे थे गंगाजल की शीशियाँ, तांबे के लोटे और रुद्राक्ष की मालाएँ।

 

*लखनऊ से हुआ शंखनाद: जब जिलाधिकारी बने सारथी*

यात्रा की रणनीति लखनऊ में बनी। तत्कालीन जिलाधिकारी आदरणीय खरे जी ने न केवल प्रशासनिक सहयोग दिया, बल्कि इस यात्रा को वैचारिक ऊँचाई भी दी। तय हुआ कि देश के 21 शीर्ष नेताओं और नीति-निर्माताओं को सद्भावना का प्रतीक भेंट किया जाएगा। इस सूची में तत्कालीन विपक्ष के नेता व पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जी एवं राष्ट्रपति महोदय सहित कई गणमान्य नाम थे।

 

प्रत्येक को तीन वस्तुएँ भेंट की गईं:

1. *गंगाजल*: गंगा-जमुनी तहज़ीब और काशी की साझी विरासत का प्रतीक।

2. *तांबे की पूजा वाली लोटिया*: भारतीय संस्कृति में शुद्धता, त्याग और दैनिक आचरण की पवित्रता का संदेश।

3. *रुद्राक्ष की माला*: भगवान शिव का आशीर्वाद, यानी ‘अभय’ और ‘कल्याण’ का भाव।

 

संदेश स्पष्ट था— राजनीतिक विचारधारा अलग हो सकती है, पर राष्ट्र की एकता के प्रश्न पर हम सब एक ही लोटे का जल हैं।

 

*वाराणसी से जम्मू: डर के साए में सद्भावना का पहिया*

सुखमंगल सिंह और कुमार हेमंत स्कूटर से निकले। लखनऊ, शाहजहाँपुर, हरियाणा होते हुए जब पंजाब में दाखिल हुए तो मंजर बदला हुआ था। हाईवे सुनसान, जगह-जगह मिलिट्री चेकपोस्ट। ढाबों पर भी लोग धीमी आवाज में बात करते थे।

 

जम्मू पहुँचते-पहुँचते यात्रा राष्ट्रीय चर्चा का विषय बन चुकी थी। पत्रकार मिलने आते, पूछते— “ऐसे माहौल में कश्मीर क्यों जा रहे हैं?” सुखमंगल जी का जवाब होता: “क्योंकि जब घर में आग लगी हो, तो कवि तमाशा नहीं देखता, बाल्टी लेकर दौड़ता है।”

 

*जहाँ रोक दिया गया रास्ता: प्रशासन की मजबूरी, यात्री का विवेक*

जम्मू में जम्मू-कश्मीर के एडीसी से भेंट हुई। उन्होंने दो टूक कहा: “आपकी भावना को सलाम है, पर इस समय श्रीनगर भेजना आत्मघाती होगा। घाटी में एक भी बाहरी वाहन सुरक्षित नहीं। हम लिखित में अनुमति नहीं दे सकते।”

 

यह यात्रा का सबसे कठिन मोड़ था। श्रीनगर जाकर शंकराचार्य मंदिर में गंगाजल चढ़ाना मूल संकल्प था। पर सुखमंगल सिंह ने प्रशासन से टकराव नहीं, सहयोग का रास्ता चुना। उन्होंने कहा, “देश सबसे पहले है। यदि हमारा जाना जवानों पर अतिरिक्त बोझ बनेगा, तो हम नहीं जाएँगे।”

 

तब तय हुआ कि यात्रा को माँ वैष्णो देवी के दरबार तक सीमित किया जाए।

 

*कटरा से भवन तक: जहाँ पूरी हुई प्रतीक यात्रा*

जम्मू से कटरा और फिर 13 किलोमीटर की चढ़ाई। 1994 में आज जैसी सुविधाएँ नहीं थीं। रास्ते में आतंकी हमले का खतरा लगातार बना रहता था। पर दोनों यात्री “जय माता दी” के जयकारों के साथ बढ़ते रहे।

 

भवन पर पहुँचकर सुखमंगल सिंह ने काशी से लाया गंगाजल माँ के चरणों में अर्पित किया। रुद्राक्ष की माला चढ़ाई और हाथ जोड़कर प्रार्थना की: “हे माँ, यह जल कश्मीर की वादियों तक पहुँचे। घाटी में फिर से चिनार के पत्तों के साथ अमन के गीत गूँजें।”

 

उनके लिए यही कश्मीर था। माँ का दरबार ही वह संगम बन गया जहाँ काशी का संदेश कश्मीर की पीड़ा से मिला।

 

*वापसी: जब ट्रेन बनी स्कूटर की सवारी*

लौटना भी किसी अभियान से कम नहीं था। स्कूटर को ट्रेन के लगेज डिब्बे में चढ़ाना, गार्ड से मिन्नतें करना, और फिर 36 घंटे का सफर तय कर वाराणसी जंक्शन उतरना। प्लेटफार्म पर उतरे तो लोगों ने घेर लिया। किसी ने फूल माला पहनाई, तो किसी ने पूछा— “क्या फायदा हुआ?”

 

सुखमंगल जी मुस्कुराए और बोले, “फायदा तुरंत नहीं दिखता भाई। हमने बीज बोया है। गंगाजल मिट्टी में मिल गया है। कभी न कभी तो चिनार पर फूल खिलेंगे।”

 

*तीन दशक बाद भी प्रासंगिक यात्रा*

आज जब हम 2026 में खड़े हैं, यह यात्रा और प्रासंगिक लगती है। यह बताती है कि संकट के समय देश को नारों से ज्यादा संकल्प चाहिए। एक जिलाधिकारी का साथ, एक कवि की जिद, और एक स्कूटर की सवारी— मिलकर बता गए कि सद्भावना की कोई ‘नो-एंट्री’ नहीं होती।

 

सुखमंगल सिंह जी की यह यात्रा सरकारी फाइलों में दर्ज नहीं है, पर काशी के साहित्यिक मंचों और जम्मू के पुराने पत्रकारों की स्मृति में आज भी जिंदा है। यह याद दिलाती है कि जब बंदूकें गरजती हैं, तब कलम को और ऊँची आवाज में बोलना पड़ता है।

 

_लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और 1990 के दशक में उत्तर भारत की रिपोर्टिंग कर चुके हैं। प्रतिक्रिया: sukhmangal@gmail.com_

 

सुख मंगल सिंह वरिष्ठ साहित्यकार कवि एवं लेखक वाराणसी

8931966034

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