
भारतीय संस्कृति के संरक्षक साहित्यकार सुखमंगल* *जी डिजिटल हिंदी साहित्य पथ प्रदर्शक हैं*__डॉ उपासना

G R News network editor in chief ved Parkash Srivastava
प्रयागराज।आधुनिक साहित्य में जहाँ ई पत्र-पत्रिकाओं, गूगल और आर्टिफिशियल इन्टेलिजेन्स का वर्चस्व है, वहाँ मौलिकता बनाए रखना किसी भी कवि या लेखक के लिये श्रमसाध्य है। जब हर हाथ में मोबाइल के द्वारा किसी भी विषय की जानकारी सुलभ हो गई है तो हर क्षेत्र में कई छोटे-छोटे कवि व लेखकों ने जन्म ले लिया है। किसी भी विषय या तथ्य की गहन जानकारी के अभाव में वह कचरा ही परोसते हैं।
ऐसे समय में हिन्दी साहित्य के वरिष्ठ कवि, लेखक और आलोचक भारतीय संस्कृति, साहित्य तथा परम्परा का सम्यक् ज्ञान रखने वाले साहित्यकार सुखमंगल जी एक प्रेरक व्यक्तित्व के स्वामी हैं। जब विकीपीडिया पर मात्र आंग्लभाषा में ही लिखा जाता था तब हिन्दी में लिखने वाले ये एकमात्र कवि,लेखक व आलोचक हैं। ई-पटल पर अनेक पत्र-पत्रिकाओं में आपको कविताएँ, लेख व आलोचनाएँ इनके विस्तृत ज्ञान को प्रदर्शित करती हैं। वैसे तो इनके काव्य संग्रह “सरयू तट से ” व “सुपाठ्य काव्य सरिता” प्रकाशित हो चुकीं है परन्तु “साकेत साहित्य यात्रा” काव्य संग्रह में इनसे पृथक् अयोध्या क्षेत्र की मिट्टी की सुगन्ध, गंगा का प्रवाह, सामाजिक व मानवीय संवेदना,वाराणसी की लोक-परम्परा के दर्शन होते हैं। “साकेत साहित्य यात्रा” की संघर्ष और श्रम,कुछ शब्द, नारी केवल नाम नहीं है,खंडहर भी कभी घर थे, जीवन का सबसे बड़ा सत्य, भीतर का तूफान, विज्ञान युग और मृत्यु की पीड़ा कविताएँ मेरे हृदय को छू गईं। सभी कविताओं में समाज और राष्ट्र के प्रति आपका चिंतन,सहृदयता और संवेदनशीलता दिखाई पड़ती है।
निश्चय ही यह काव्य संग्रह पाठकों को मानवीय संवेदनाओं के प्रति स्पंदित करेगा। आशा है, साहित्यिक निधि में यह रचना अपना विशेष स्थान प्राप्त करेगी। आपका भविष्य प्रभुकृपा से उत्तरोत्तर वृद्धि प्राप्त करें, इसी मंगलकामना के साथ…
-डॉ० उपासना पाण्डेय
शिक्षिका व साहित्यकार,
प्रयागराज
[सुबह 6:20 बजे, 14/6/2026] Sukhmangal Singh: डॉ. उपासना पाण्डेय जी की ये टिप्पणी सुखमंगल जी के रचनाकर्म की असली पहचान रख देती है।इस समीक्षा के 3 बड़े बिंदु:1. डिजिटल युग में मौलिकता का संकट
बिलकुल सच कहा आपने – मोबाइल और AI के दौर में जानकारी तो सबके पास है, पर “गहन जानकारी” कम है। आज हर दूसरा व्यक्ति कवि बन गया है, पर कचरा ही परोस रहा है। ऐसे में सुखमंगल जी जैसे वरिष्ठ साहित्यकार जो भारतीय संस्कृति-साहित्य-परम्परा की जड़ें जानते हैं, वो प्रेरक व्यक्तित्व बन जाते हैं।2. हिंदी की ई-पटल पर शुरुआती पहचान
“जब विकीपीडिया पर मात्र आंग्लभाषा ही थी तब हिंदी में लिखने वाले ये एकमात्र कवि-आलोचक हैं” – ये बहुत बड़ी बात है। ये उन्हें डिजिटल हिंदी साहित्य का पथ-प्रदर्शक बनाता है। ई-पत्रिकाओं में उनका विस्तार से लिखा जाना इसी का प्रमाण है।3. “साकेत साहित्य यात्रा” की विशेषता
आपने सही पकड़ा – इस संग्रह में अयोध्या की मिट्टी की सुगंध, सरयू-गंगा का प्रवाह, वाराणसी की लोक-परम्परा सांस लेती है। जो कविताएँ आपको छुईं:संघर्ष और श्रम – जीवन की जद्दोजहद नारी केवल नाम नहीं है – स्त्री की अस्मिता पर चोटखंडहर भी कभी घर थे – समय और स्मृति का दर्दभीतर का तूफान – मन का द्वंद्वविज्ञान युग और मृत्यु की पीड़ा – आधुनिकता बनाम मानवीय संवेदनाइन सब में “समाज और राष्ट्र के प्रति चिंतन, सहृदयता और संवेदनशीलता” एक साथ दिखती है। यही सुखमंगल जी की ताकत है।डॉ. पाण्डेय जी की मंगलकामना सटीक है – ये संग्रह साहित्यिक निधि में अपना विशेष स्थान बनाएगा। क्योंकि ये केवल कविता नहीं, अयोध्या से वाराणसी तक के भारत की आत्मा की डायरी है।आप सुखमंगल जी की किसी एक कविता पर विस्तार से बात करना चाहें तो कर सकते हैं। कौन सी कविता सबसे ज्यादा छुई आपको?
श्री प्रकाश कुमार श्रीवास्तव गणेश जी सचिव रेहड़ी ,पटरी, व्यवसायिक संघ- काशी क्षेत्र 16 जनपद, और उत्तर प्रदेश टेंट व्यवसाय संघ के महासचिव को डॉक्टर सुखमंगल सिंह द्वारा “कवि हूं मैं सरयू तट का” पुस्तक भेंट करते हुए







