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जनप्रतिनिधियों ने की उ पेक्षा पर गाजीपुर का, दशरथ मांझी ,बना सेना का जवान रिटायरमेंट के पैसे से बनवा रहा पुल, 15 गांव के लोगों ने भी की मदद**

GRNews Network editor in chief ved Prakash shrivtastav
गाजीपुर के एक गांव में एक रिटायर आर्मी के जवान ने 15 गांव के लोगों के लिए उनकी मदद से ही पुल बनाने की ठानी है. इसके लिए उन्होंने रिटायरमेंट में मिला अपना पूरा पैसा लगा दिया. उनके साथ ही गांव के लोग भी पुल बनाने के लिए चंदा दे रहे हैं. ये पुल मगई नदी पर बनाया जा रहा है, जो 15 गांवों को जोड़ेगा. इन लोगों को गांव से गाजीपुर पहुंचने में 30 किलोमीटर का सफर तय करना पड़ता है.
दशरथ मांझी को कौन नहीं जानता, जिन्होंने एक हथौड़ी और छेनी से पहाड़ को काटकर सड़क बना दी थी. लोग उन्हें माउंटेन मैन के रूप में भी जानते हैं. ऐसा ही कुछ गाजीपुर में एक आर्मी के जवान ने भी किया. उन्होंने अपने गांव के साथ आसपास के 15 गांव के बीच बहने वाली मगई नदी पर बगैर किसी सरकारी बजट के पुल बनाने की ठानी है. उस पुल के पिलर का निर्माण भी पूरा हो चुका है.
अब उसकी स्लैब की ढलाई का काम कराया जा रहा है, जिसके लिए आर्मी मैन ने खुद के रिटायरमेंट के 10 लाख रुपए दिए और आसपास के गांव के लोगों से करीब 60 से 70 लाख रुपए चंदा लेकर पुल का निर्माण कराया जा रहा है, जो लोग चंदा नहीं दे पा रहे हैं. वह खुद पुल के निर्माण में मजदूरी कर रहे हैं. गाजीपुर के नोनहरा थाना क्षेत्र के पयामपुर छावनी गांव समेत करीब 14-15 गांव के लोगों को जाने के लिए मगई नदी पार करनी पड़ती है.
यहां के लोगों के लिए सिर्फ एक साधननाव से नदी को पार करना होता है, जिसके लिए आजादी के बाद से लेकर अब तक वहां के लोग शासन प्रशासन जनप्रतिनिधि से गुहार लगाते रहे, लेकिन सब चुनावी बिगुल की तरह आते हैं. वादा भी करते हैं, लेकिन चुनाव बीत जाने के बाद उनका वादा वादा ही रह जाता है. इसलिए इस गांव के लोग नदी पर लकड़ी का पुल बनाकर आने-जाने का काम करते हैं, तो वहीं बाढ़ के दिनों में एक छोटी नाव के सहारे लोगों का आवागमन होता है.
वहीं इस गांव की सड़क से गाजीपुर की दूरी 18 किलोमीटर है. अगर उस सड़क से यह लोग गाजीपुर आते हैं तो उसकी दूरी 42 किलोमीटर हो जाती है, जबकि थाना बगल में ही करीब 3 किलोमीटर की दूरी पर है और सड़क से आने पर 30 किलोमीटर की यात्रा करने के बाद थाने पर पहुंचा जाता है. इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि यहां के लोगों को पुल की कितनी जरूरत होगी
पिछले दिनों गांव के ही रहने वाले रविंद्र यादव, जो सेना के इंजीनियरिंग कोर में 55 इंजीनियर रेजीमेंट से रिटायर होने के बाद जब गांव पहुंचे और वहां की समस्याओं को देखा. तब उन्होंने पुल बनाने की ठानी. उन्होंने अपने रिटायरमेंट के 10 लाख रुपए पुल बनाने के लिए पहले डोनेट करने की घोषणा की. इसके बाद पिछले साल 25 फरवरी 2024 को इलाहाबाद हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति शेखर कुमार यादव ने उस पुल का भूमि पूजन और शिलान्यास कार्यक्रम किया. ऐसे में लोगों से चंदे और पुल के निर्माण वाली सामग्री देने का सिलसिला बढ़ता चला गया. मौजूदा समय में नदी के अंदर दो पिलर गांव वालों की मदद से पड़ चुके हैं और नदी के दोनों सिरे पर अप्रोच मार्ग का निर्माण भी हो चुका है. वहीं मौजूदा समय में अब पुल के स्लैब की ढलाई का काम लोगों के चंदे से किया जा रहा है.
सेना के जवान रविंद्र यादव ने बताया कि उनका गांव गाजीपुर में है, लेकिन लोकसभा बलिया और विधानसभा मोहम्मदाबाद में पड़ती है. इतना ही नहीं उनके गांव के बगल में ही जम्मू कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा का भी गांव पड़ता है, जो गाजीपुर के सांसद और रेल राज्य मंत्री भी रह चुके हैं. इस पुल के लिए गांव के लोगों ने पिछले कई सालों से संघर्ष कर कोई भी ऐसा जनप्रतिनिधि नहीं रहा, जिसके दरवाजे पर जाकर पुल निर्माण करने की मांग ना रखी हो, लेकिन सभी चुनाव की तरह आश्वासन तो देते हैं, लेकिन आज तक पुल निर्माण के लिए किसी ने एक पत्र नहीं लिखा.
उन्होंने बताया कि वह खुद सेना के इंजीनियरिंग कोर में रह चुके हैं और सिविल जेई डिप्लोमा होल्डर हैं. इसके अलावा वह एक अन्य आर्किटेक्ट की देखरेख में इस पुल की डिजाइनिंग और उसके निर्माण कार्य को आगे बढ़ा रहे हैं. उन्होंने बताया कि इस पुल की लंबाई 105 फीट है, जबकि नदी में दो पिलर और फिर अप्रोच के लिए रास्ते का भी काम लोगों के चंदे से किया जा रहा है. उन्होंने बताया कि जब इस मगई नदी में बाढ़ आ जाती है. तब इन लोगों ने जो लकड़ी का पुल बनाया है. वह भी टूट जाता है और फिर एक नाव के सहारे ही करीब 14 से 15 गांव के आने-जाने का एकमात्र विकल्प रहता है, जिसके लिए लोगों को घंटा घंटा भर इंतजार करना पड़ता है.

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