*वाराणसी में पंचाचार्य ध्वजारोहण के साथ हुआ दो दिवसीय जगद्गुरु विश्वाराध्य जयन्ती का शुभारम्भ |*| *हम काशीवासियों के लिए एक तीर्थ के समान है – आलोक पराडकर* ||

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एडिटर इन चीफ वेद प्रकाश श्रीवास्तव
वाराणसी:- दो दिवसीय जगद्गुरु विश्वाराध्य जयन्ती का शुभारम्भ जंगमबाड़ी स्थित जंगमबाड़ी मठ में आदय संस्थापक जगद्गुरु विश्वाराध्य का जयन्ती महोत्सव 7 मार्च गुरुवार को जगद्गुरु 1008 डॉ.चन्द्रशेखर शिवाचार्य महास्वामी एवं 1008 डॉ.मल्लिकार्जुन विश्वाराध्य महास्वामी के कर कमलों से पंचाचार्य ध्वजारोहण के साथ हुआ | कार्यक्रम के दूसरी श्रृखंला में प्रतिवर्ष दिया जाने वाला जगद्गुरु विश्वाराध्य विश्वभारती पुरस्कार इस वर्ष आचार्य राजाराम शुक्ल को प्रदान किया, इसी प्रकार दूसरा कोडीमठ संस्कृत साहित्य पुरस्कार सम्पूर्णानन्द विश्वविद्यालय के डॉ.द्विव्यचेतन ब्रह्मचारी को तथा इस वर्ष का आचार्य व्रजवल्लभ द्विवेदी शैव भारती पुरस्कार डॉ.रमाकान्त पाण्डेय को प्रदान किया गया तथा लि.सौ.सिन्धु सुभाष म्हमाने मातृशक्ति पुरस्कार काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की प्रो.स्वरवन्दना शर्मा को एवं जयदेवश्री हिन्दी साहित्य पुरस्कार ख्यातिलब्ध लेखक आलोक पराड़कर को तथा पंचाचार्य पंचसूत्राणि गौरव पुरस्कार प्रो.वागीश दिनकर हापुड़ उ.प्र.को प्रदान किया गया | शिवार्पण की श्रृखंला में जगद्गुरु 1008 डॉ.चन्द्रशेखर शिवाचार्य महास्वामी के द्वारा रचित पंचाचार्य पंच सूत्राणि एवं वीर शैव आचार्य परम्परा विमर्श लेखक डॉ.ददन उपाध्याय का शिवार्पण 1008 डॉ. मल्लिकार्जुन विश्वाराध्य शिवाचार्य महास्वामी के कर कमलों से सम्पन्न हुआ | विश्व भारती सम्मान से सम्मानित आचार्य राजाराम शुक्ल ने अपने सम्मान के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि यह सम्मान मेरे लिये सर्वोच्च अलंकरण है ज्ञान सिंहासन की अटूट परम्परा का यह मठ साक्षी है यहां समाज के सभी साहित्यिक विकास को महत्व दिया जाता है |
यतार्थतः ज्ञान सिंहासन अज्ञानरूपी नेत्रों को खोलने का मार्ग प्रशस्त करता है कोडिमठ सम्मान से सम्मानित डॉ. द्विव्यचेतन ब्रकृमचारी ने कहा कि यह स्थान जगतगुरूओ के प्राकट्य का प्रमुख केन्द्र है जहां हजारो वर्षों की परम्परा रही है | आचार्य व्रजवल्लभ द्विवेदी शैव भारती सम्मान से सम्मानित आचार्य रमाकान्त पाण्डेय ने कहा यहां शैवागम साहित्य के सृजन की एक बहुत प्राचीन परम्परा है शैवागमों के उन्नयन में यह मठ सर्वदा अग्रणीय रहा है | प्रो.स्वरवन्दना शर्मा ने अपने स्वागत के प्रतित्तोर में कहा कि इसके स्थापना काल से माँ सरस्वती का वरदहस्त रहा है यही कारण है कि यह सम्पूर्ण भारत में प्रसिदि को प्राप्त है हापुड़ से आये प्रो.वागीश दिनकर ने कहा कि इस मठ की पंचाचार्यों की जो परम्परा है वैसी परम्परा किसी अन्य स्थान पर देखने को नही मिलती मैनें पंचाचार्य परम्परा का समुल अध्ययन करने के बाद एवं कृति का प्रणयन किया है |ख्यातिप्राप्त लेखक एवं पत्रकार आलोक पराडकर ने कहा कि यहां के साहित्यीक कृतियों का हिन्दी अनुवाद होने के कारण मुझे अध्ययन करने का अवसर प्राप्त हुआ, मठ में ज्ञान गंगा की गंग धारा निरन्तर बहती रहती है यह हम काशीवासियों के लिए एक तीर्थ के समान है |
समारोह की अध्यक्षता करते हुए डॉ.चन्द्रशेखर शिवाचार्य महास्वामी ने कहा कि इस मठ को काशी के विद्वानों का पुराकाल से ही विद्या का सम्बन्ध रहा है और उसके फलस्वरूप मठ ने अब तक 90 आगमशास्त्र के ग्रंथो का प्रकाशन सम्भव हो सका है जगद्गुरू 1008 डॉ मल्लिकार्जुन ने कहा कि यहाँ कोई प्रान्तववाद नहीं है केवल विद्यावाद की पूजा होती है | महाशिवरात्रि के अवसर पर चारो ओर लघुभारत का रूप देखने को मिलता है मठ परिवार की ओर से आये हुए सभी 250 विद्वानों का सम्मान किया गया ||








