
यात्रा संस्मरण का द्वितीय भाग – 31 अगस्त 2026, हरिद्वार”*

*GRnews network & YouTube channel editor in chief Ved prakash Srivastava
हरिद्वार।पाँच यात्री – वही: -वरिष्ठ साहित्यकार सुखमंगल सिंह जी, कवि इंद्रजीत तिवारी ‘निर्भीक’, अधिवक्ता पवन कुमार सिंह, प्रवक्ता बी. डी. वर्मा जी, विजय कुमार गुप्ता जी।
सुबह हरिद्वार की भोर। हम सब अवधूत आश्रम, शंकर चौराहा से टेंपो पकड़ कर हरिद्वार के लिए निकले। आज का दिन ज्ञान और वैराग्य के नाम था।
पहला पड़ाव – गीता भवन
हर की पौड़ी के पास ही विशाल गीता भवन। दीवारों पर पूरी गीता चित्रों के साथ लिखी है। अंदर सैकड़ों कमरे, हजारों यात्री, पर शोर कहीं नहीं – बस शांति। सुखमंगल सिंह जी बोले – “काशी में शास्त्रार्थ होता है, यहाँ शास्त्र दीवारों पर चुपचाप पढ़ाता है।”
हमने वहाँ भगवान कृष्ण-अर्जुन की झाँकी का दर्शन किया। बी. डी. वर्मा जी हर श्लोक का अर्थ बच्चों की तरह समझा रहे थे। गीता भवन की विशेष बात – यहाँ सबको भंडारे का प्रसाद: मिलता है। दाल, रोटी, सब्जी, खीर। पंक्तियों में बैठ कर पाँचों मित्रों ने प्रसाद पाया। पवन जी बोले – “अदालत में इंसाफ के लिए धक्के खाते हैं, यहाँ बिना माँगे प्रसाद मिलता है, यही तो भगवान की अदालत है।”
दूसरा पड़ाव – भारत माता मंदिर
यह मंदिर सप्ततल का है। अनोखा मंदिर जहाँ देवी-देवता नहीं, भारत माता है।
पहले तल पर भारत माता, दूसरे पर शूर मंदिर, तीसरे पर मातृ मंदिर, चौथे पर संत मंदिर, पाँचवें पर शक्ति – हर तल पर भारत का इतिहास, शूरवीर, स्वतंत्रता सेनानी। ऊपर से हरिद्वार का विहंगम दृश्य। विजय गुप्ता जी भावुक हो गए, बोले – “तीर्थ तो बहुत देखे, पर अपने देश का तीर्थ पहली बार देखा।”
अन्य मंदिर – माया देवी, दक्ष महादेव, पावन धाम, वैष्णो देवी धाम
इसी क्रम में हम माया देवी शक्तिपीठ, कनखल में दक्ष महादेव मंदिर और काँच के चमकते पावन धाम के दर्शन करते हुए बाजार से निकले।
और बाजार में तो वैराग्य टूट ही गया। सबको अपने घर की याद आई।
कवि निर्भीक जी ने अपने पोती के लिए छोटी सी धोती-कुर्ता ली और अपने लिए दो कुर्ता, पवन जी ने बेटी के लिए चुन्नी और एक कुर्ता, वर्मा जी ने पौत्री के लिए फ्रॉक, और एक कुर्ता। गुप्ता जी ने पूरे परिवार के लिए हरिद्वार की प्रसिद्ध रुद्राक्ष माला और सुखमंगल जी ने अपने पौत्रों के लिए ‘राधे-राधे’ लिखी टी-शर्ट, अपने लिए और अपने लड़के के लिए एक- एक कुर्ता और एक पजामा लिए।
दुकानदार हँसा – “बाबू जी, ज्ञान ले कर वैराग्य लेने आए थे, मोह ले कर जा रहे हो।”
सुखमंगल जी बोले – “यही तो ज्ञान है, वैराग्य अपने लिए और मोह अपनों के लिए।”
शाम ढले हम टेंपो से फिर *अवधूत आश्रम, शंकर चौराहा* लौट आए। टेंपो में गंगा की हवा, हाथ में प्रसाद के थैले और बच्चों के कपड़े।
रात्रि में आश्रम के आँगन में सुखमंगल सिंह जी ने उस दिन की अनुभूति पर अपनी एक बेहतरीन रचना सुनाई, जिसे सुन कर सबकी आँखें नम हो गईं –
रचना – “ज्ञान और वैराग्य का संगम”
*रचनाकार – सुखमंगल सिंह ‘मंगल’ वाराणसी*
> गीता भवन में गीता बोली, माटी बोली भारत माता।
> एक में कृष्ण का ज्ञान लिखा, दूजे में भारत का नाता।।
> भंडारे की एक पंगत में, राजा-रंक सब एक समान।
> भारत माता के आँगन में, झुका हुआ है सारा जहान।।
> कपड़े लाये नाती-पोतों के, प्रसाद बंधा है रूमाल में।
> मोह भी है, वैराग्य भी है, दोनों बंधे हैं इस थाल में।।
> कंक्रीट के जंगल से निकले, तो सच का दर्शन पाया।
> काशी के हम पाँच मुसाफिर, हरिद्वार में घर पाया।।
सबने तालियाँ बजाईं। इंद्रजीत तिवारी निर्भीक जी बोले – “मंगल भैया, आज आपने यात्रा को ग्रंथ बना दिया।”
इसी स्मृति के साथ उस रात शंकर चौराहा के पास अवधूत आश्रम में हम सो गए, सपनों में भारत माता और गीता दोनों साथ थीं।
लेखक: सुख मंगल सिंह









