
*वरिष्ठ पत्रकार एवं नवगीतकार हिमांशु उपाध्याय से नवगीत पर साक्षात्कार।* **नवगीत अतीत की धरोहर नहीं,बल्कि वर्तमान का जीवंत काव्य =उपकरण और भविष्य की संभावित साहित्यिक धारा भी है।*=== *हिमांशु उपाध्याय*

*GRNews Network Brodcast centre* editor in chief Ved prakash Srivastava
गाज़ीपुर।हिन्दी-काव्य-परम्परा का विकास निरन्तर परिवर्तन और पुनर्सृजन की प्रक्रिया से गुज़रता रहा है। छायावाद की आत्मकेन्द्रित भावभूमि से लेकर प्रगतिवाद के सामाजिक यथार्थ, प्रयोगवाद की अभिव्यक्ति-स्वतन्त्रता और नई कविता की वैचारिक जटिलताओं तक हिन्दी कविता ने समय के साथ स्वयं को रूपान्तरित किया है। इसी विकास-क्रम में गीत विधा भी स्थिर नहीं रही। पारम्परिक गीत जहाँ रागात्मकता, प्रकृति-सौंदर्य और भावुक मानवीय संवेदनाओं पर केंद्रित था, वहीं स्वतन्त्रता-प्राप्ति के बाद का भारत सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक स्तर पर जिस तीव्र संक्रमण से गुज़रा, उसने गीत की संवेदना और संरचना दोनों को बदलने की आवश्यकता उत्पन्न की। इसी आवश्यकता से नवगीत का जन्म हुआ। नवगीत का ऐतिहासिक उद्भव केवल साहित्यिक प्रयोग का परिणाम नहीं था, बल्कि यह बदलते हुए भारतीय समाज की सामूहिक चेतना की काव्यात्मक अभिव्यक्ति था। औद्योगीकरण, नगरीकरण, कृषि-संकट, विस्थापन, वर्ग-असमानता, लोकतान्त्रिक संरचनाओं की विडंबनाऍं और व्यक्ति के भीतर बढ़ती अस्तित्वगत बेचैनी, इन सबने पारम्परिक गीत की सीमाओं को चुनौती दी। परिणामस्वरूप गीत ने अपनी रागात्मकता को बचाए रखते हुए यथार्थ के कठोर धरातल को स्वीकार किया। यही परिवर्तन नवगीत का मूल स्वभाव बना। नवगीत के साहित्यिक इतिहास में ‘गीतांगिनी’ के प्रकाशन को एक निर्णायक मोड़ माना जाता है, जिसने नवगीत को केवल प्रवृत्ति नहीं बल्कि एक स्थापित काव्य-विधा के रूप में वैचारिक आधार प्रदान किया। इसके बाद शंभुनाथ सिंह सहित अनेक रचनाकारों ने नवगीत को सिद्धान्त और सृजन, दोनों स्तरों पर मजबूत किया। नवगीत ने यह स्थापित किया कि गीत केवल सौंदर्य और करुणा का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक यथार्थ की तीखी और व्यंजक अभिव्यक्ति भी हो सकता है। इसने छन्द को त्यागा नहीं, बल्कि उसे समय की लय के अनुरूप पुनर्परिभाषित किया। समकालीन संदर्भों में नवगीत की प्रासंगिकता और भी अधिक स्पष्ट होकर सामने आती है। आज का समाज तकनीकी प्रगति, डिजिटल संस्कृति, राजनीतिक जटिलताओं और मनोवैज्ञानिक दबावों से निर्मित एक बहुस्तरीय यथार्थ से गुजर रहा है। ऐसे समय में नवगीत जीवन के उन सूक्ष्म अनुभवों को स्वर देता है, जो न तो पूर्णतः पारम्परिक काव्य में समा पाते हैं और न ही पूर्णतः मुक्त छन्द की अमूर्तता में। नवगीत यथार्थ की ठोस जमीन पर खड़ा रहकर संवेदना की ऊँचाई को बनाए रखने की क्षमता रखता है। इसी पृष्ठभूमि में प्रस्तुत यह साक्षात्कार केवल एक साहित्यकार से संवाद भर नहीं है, बल्कि नवगीत की वैचारिक यात्रा, उसकी सामाजिक भूमिका और उसके भविष्य की संभावनाओं पर गंभीर विमर्श भी है। श्री हिमांशु उपाध्याय जैसे रचनाकार, जो पत्रकारिता और साहित्य, दोनों क्षेत्रों में सक्रिय रहे हैं, नवगीत को केवल काव्य-विधा के रूप में नहीं, बल्कि सामाजिक अनुभव के सघन दस्तावेज के रूप में देखते हैं। 4 जुलाई 1957 को जन्मे हिमांशु उपाध्याय पण्डित द्विजदेव उपाध्याय और गंगोत्री उपाध्याय के संस्कारवान परिवार में पले-बढ़े और काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की विद्या निष्ठ परम्परा ने उनके वैचारिक व्यक्तित्व को व्यापक आयाम दिया। जनवार्ता, स्वतन्त्र भारत, अमर उजाला और दैनिक जागरण जैसे प्रतिष्ठित समाचार पत्रों में पूर्णकालिक पत्रकारिता करते हुए उन्होंने समाज के जमीनी यथार्थ को निकट से देखा और उसी अनुभव-संपदा को अपने साहित्यिक लेखन में रूपायित किया। हिन्दी पत्रकारिता और साहित्य के क्षेत्र में उन्हें अनेक सम्मानों से अलंकृत किया गया। उनकी प्रकाशित कृतियों में ‘आज नहीं तो कल’ तथा ‘एक दीया यादों का’ जैसे कविता संग्रह संवेदनात्मक गहराई का परिचय देते हैं, ‘काशी की शिक्षण संस्थाओं का इतिहास’ उनके शोधपरक अध्ययन को रेखांकित करता है, ‘क्रांतिवीर शचींद्रनाथ सान्याल’ राष्ट्रीय चेतना का द्योतक है, ‘यशस्वी संपादक नरेंद्र मोहन’ पत्रकारिता जगत का सजीव दस्तावेज है, जबकि ‘ज्योति कलश छलके’ यात्रा-वृत्तान्त और ‘लौटती हुई धूप’ जीवनानुभवों की परिपक्व मानवीय दृष्टि को अभिव्यक्त करती है। उनके विचारों में नवगीत की परम्परा, वर्तमान और भविष्य, तीनों का संतुलित दृष्टिकोण दिखाई देता है। इस साक्षात्कार की विशेषता यह भी है कि इसमें नवगीत को केवल सैद्धान्तिक विमर्श तक सीमित नहीं रखा गया, बल्कि उसे पत्रकारिता, डिजिटल युग, नई पीढ़ी और बदलते सांस्कृतिक परिदृश्य के सन्दर्भ में भी देखा गया है। इससे यह स्पष्ट होता है कि नवगीत केवल अतीत की धरोहर नहीं, बल्कि वर्तमान का जीवन्त काव्य-उपकरण और भविष्य की सम्भावित साहित्यिक धारा भी है। नवगीत का मूल स्वर मानवीय संवेदना, सामाजिक यथार्थ और सांस्कृतिक चेतना के त्रिकोण में विकसित होता है। यह साक्षात्कार इसी त्रिकोण की वैचारिक और सृजनात्मक व्याख्या प्रस्तुत करता है। इस दृष्टि से यह संवाद नवगीत के अध्ययनकर्ताओं, शोधार्थियों और साहित्य-प्रेमियों के लिए महत्त्वपूर्ण दस्तावेज की तरह देखा जा सकता है। अंततः कहा जा सकता है कि नवगीत भारतीय काव्य परम्परा का वह आधुनिक स्वर है, जिसने समय की धड़कनों को शब्दों की लय में बाँधने का साहस किया है। यह साक्षात्कार उसी साहस, उसी संवेदना और उसी वैचारिक प्रतिबद्धता का प्रमाण है।
– डॉ.अक्षय पाण्डेय








