
तुम्ह सम पुरुष न मो सम नारी

मोहन तिवारी
गाजीपुर। अति प्राचीन श्री रामलीला कमेटी हरिशंकरी के तत्वाधान में रामनलीला मैदान लंका में नक्कटैया प्रसंग का मंचन किया गया। लंकानरेश महाराज रावण की बहन शूर्पनखा किसी कारण वश नगर भ्रमण करते हुए पंचवटी पहुंची। वहां देखा कि दो वीर पुरुष स्त्री के साथ कुटिया बनाकर निवास कर रहे हैं। वह उनके पास जाकर उनका परिचय पूछती है जिसको सुनकर वीर पुरुषों ने अपना परिचय राम तथा अपने छोटे भाई का नाम लक्ष्मण और अपने पत्नी का नाम सीता बताया और उसके आने का प्रयोजन भी पूछा। शूर्पणखा ने दोनों वीर पुरुषों का राम और लक्ष्मण नाम सुना तो सबसे पहले वह राम से कहती है कि हे वीर पुरुष। तुम्ह सम पुरुष न मो सम नारी। यह संजोग विधि रचा बिचारी। कहती है कि हे वीर पुरुष तुम्हारे जैसा सुन्दर तथा बलशाली पुरुष और मेरे जैसी नारी यह जोड़ी तीनो लोक में नहीं मिली यह विधि ने संजोग से ही रचा है। मैं अब तक कुंवारी हूं। मैं आपसे बिवाह करना चाहती हूं।श्री राम ने उसके पूरे बातो को सुनकर अपने छोटे भाई लक्ष्मण के पास भेजते हैं। वह इस तरह इधर-उधर भटकती रही अंत में वह अपने असली रूप में आकर सीता पर झपट्टी। इतने में अपने बड़े भाई श्री राम का इशारा पाते हैं लक्ष्मण ने अपने तेज शस्त्र से उसका नाक और कान काट दिया।
वह रोती बिलखती अपने भाई खर दूषण के पास जा कर अपने नाक कान कटने के विषय में सब कुछ बता देती हैं। इतना सुनने के बाद खरदूषण क्रोधित होकर अस्त्र-शस्त्र व सेना के साथ रणभूमि में जाकर श्री राम लक्ष्मण को युद्ध करने के लिए ललकारते है। श्री राम लक्ष्मण ने खर दूषण के ललकार को सुनकर रणभूमि में आकर युद्ध करते हुए दोनों भाइयों को मार गिराया।
खरदूषण के मारे जाने के बाद शूर्पणखा रोती बिलखती अपने बड़े भाई महाराज रावण के दरबार पहुंची। महाराज रावण ने अपने बहन शूर्पणखा के दशा को देखकर भड़क उठते हैं। वह क्रोधित होकर पूछते हैं कि बहन तुम्हारी यह दशा किसने बिगाड़ दी, किसका काल उसके सिर पे नाच रहा है, यह सुनते ही शूर्पणखा ने कहा कि पंचवटी में दो वीर पुरुष अपनी पत्नी के साथ कुटिया बना कर निवास कर रहे हैं । वे अपना परिचय राम लक्ष्मण बताया उनके साथ सीता नाम की सुन्दरी भी है। इतना सुनते ही वह अपने राज दरबार से उठकर रथ द्वारा आकाश मार्ग से अपने मामा मारीच के पास जाकर स्वर्ण मृग बनने का आदेश देता है। मामा मारीच रावण के डर से स्वर्ण मृग बनकर जंगल में इधर उधर घूमने लगा। सीता जी की दृष्टि सोने के मृग पर पड़ी, उन्होंने श्री राम से सोने के मृग के लिए अपनी इच्छा जाहिर की। सीताजी के कहने पर धनुष-बाण लिए श्री राम मृग के पीछे घने जंगल की ओर चल पड़े। थोड़ी देर सीता जी के कान में बचाओ की आवाज सुनाई देती है तो श्री राम की सहायता के लिए वह लक्ष्मण को जाने का आदेश देती है लक्ष्मण जी सीता के आदेश पर कुटिया के चारों और रेखा खींचकर लक्ष्मण भी अपने भाई की सहायता के लिए चल देते हैं। उधर सून सान कुटिया पाकर रावण साधु के वेष में जाकर सीता से भिक्षा का आवाज देता है। साधु के आवाज को सुनकर सीता जी आश्रम के अंदर से कंदमूल फल लेकर बाहर आती है तो रावण ने देखा कि कुटिया के चारों ओर रेखा खींचा गया है वह कहता है कि रेखा के बाहर आकर भिक्षा दीजिए तब मैं भिक्षा लूंगा। सीता जी साधु के आदेश का उलंघन करके रेखा से बाहर आती है तो रावण साधु का वेष त्याग कर अपने असली रूप को धारण करके सीता जी का हरण कर लेता है। मेला का संचालन बंदे बाणी विनायकौ आदर्श श्री रामलीला मंडल के मुखिया पं. श्रीराजाजीभैया कर रहे थे।
















