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गाजीपुर: “रात कब ढल गई सितारों से पूछो/लहरें कितना मचलती हैं किनारों से पूछो”- कवि दिनेशचंद्र शर्मा*

GR news network* editor in chief ved Prakash shrivtastav

गाजीपुर। साहित्य चेतना समाज के तत्वावधान में ‘चेतना-प्रवाह’ कार्यक्रम के अन्तर्गत गाजीपुर नगर से दूर ग्राम अहीरपुरवा,जंजीरपुर में सेवानिवृत्त शिक्षक धर्मदेव यादव के आवास पर सरस काव्य-गोष्ठी का आयोजन किया गया।अध्यक्षता वरिष्ठ कवि कामेश्वर द्विवेदी एवं संचालन सुपरिचित नवगीतकार डा. अक्षय पाण्डेय ने किया।कार्यक्रम में अतिथि के रूप में उपस्थित संस्था की मीरजापुर इकाई के प्रभारी कवि-लेखक आनन्द अमित को संस्था के संस्थापक अमरनाथ तिवारी अमर, संगठन सचिव प्रभाकर त्रिपाठी एवं अतिथियों ने माल्यार्पण करते हुए अंगवस्त्रम् प्रदान कर सम्मानित किया। मंचीय औपचारिकताओं के पश्चात् आगंतुक कविगण एवं अतिथियों का संस्था के संस्थापक अमरनाथ तिवारी अमर ने वाचिक स्वागत के साथ ही कवियों को माल्यार्पण एवं अंगवस्त्रम् के द्वारा अलंकृत किया। गोष्ठी का शुभारंभ महाकवि कामेश्वर द्विवेदी की वाणी-वंदना से हुआ।तदुपरान्त साहित्य चेतना समाज के संस्थापक अमरनाथ तिवारी अमर ने चेतना-प्रवाह कार्यक्रम के मूल उद्देश्य पर विशद प्रकाश डाला। काव्यपाठ के क्रम में कवि हरिशंकर पाण्डेय ने अपना गीत “असहाय पिता और बेबस पिता/दिल के हालात ख़ुद जानता है पिता/ज़ख़्म कितने मिले जानता है पिता/फिर भी मौन सदा साधता है पिता” प्रस्तुत कर प्रशंसित रहे। वरिष्ठ हास्य-व्यंग्यकार विजय कुमार मधुरेश ने “जो ऊपर से दिखते उजले सदा/दिल भी वैसा ही हो ये ज़रूरी नहीं” सुनाकर ख़ूब वाहवाही लूटी। ओज के कवि दिनेशचन्द्र शर्मा ने अपनी कविता “रात कब ढल गई सितारों से पूछो/लहरें कितना मचलती हैं किनारों से पूछो” सुनाकर ख़ूब तालियां अर्जित की।युवा नवगीतकार डा. अक्षय पाण्डेय ने वर्तमान में वैश्विक युद्धक परिदृश्य को केंद्र में रखते हुए अपना ‘आओ युद्ध-युद्ध खेलें हम’ शीर्षक व्यंग्य-नवगीत “शोकसभा में खड़े तथागत/

मरी आज करुणा/और हुईं हैं शक्तिशालिनी

हिंसा,वैर-घृणा/चीख-पुकारें, रुदन-पलायन/

निरपराध मत गिन/आओ युद्ध-युद्ध खेलें हम

ताक धिना धिन धिन” सुनाकर श्रोताओं को ताली बजाने के लिए विवश कर दिया। नगर के वरिष्ठ व्यंग्य-कवि अमरनाथ तिवारी अमर ने अपनी व्यंग्य-कविताऍं सुनाकर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। कवि आनन्द अमित ने अपना गीत “रोक उखड़ती साॉंसों को तू/मर-मर कर भी जीना सीख/जैसे मधुरस पीता है रे/घूॅंट ज़हर का पीना सीख” सुनाकर श्रोताओं की प्रशंसा पाई। इसी क्रम में धर्मदेव यादव धर्मेश ने अपनी कविता “कर्म के यज्ञ में श्रम की दे आहुति/चारों फल ज़िन्दगी के ही पाते चलो/दीन दुखियों को अपना सखा मानकर/दे ख़ुशी उनको उर से लगाते चलो” सुनाकर श्रोताओं को आत्मविभोर कर दिया। अध्यक्षीय काव्यपाठ करते हुए महाकाव्यकार कामेश्वर द्विवेदी ने अपनी छान्दस कविता”प्रेम की सुगन्ध निज बिखेर दीजिए/दीप को जलाकर तिमिर दूर कीजिए” प्रस्तुत कर श्रोताओं की अकूत तालियां अर्जित की। इस सरस काव्यगोष्ठी में प्रमुख रूप से शशांकशेखर पाण्डेय,जयदेव यादव,हनुमान यादव,लीलावती,सूरज,सुभाष,लालबहादुर,तेज बहादुर आदि उपस्थित रहे। अन्त में संस्था के संगठन सचिव प्रभाकर त्रिपाठी ने सभी के प्रति आभार व्यक्त किया।

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