*लाइलाज है उत्तर प्रदेश पुलिस -राजीव कुमार ओझा *

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चाल चरित्र और चेहरे की बात करने वाली भाजपा और उत्तर प्रदेश की डबल इंजन वाली भाजपा सरकार के राम राज के दावों को उत्तर प्रदेश पुलिस के चाल चरित्र और चेहरे के आईने में देखें तब आप पाएंगे की उत्तर प्रदेश पुलिस का चाल चरित्र और चेहरा आज भी वैसा ही है जिसे देख कर इलाहाबाद हाई कोर्ट के विद्वान जस्टिस मुल्ला ने कहा था की उत्तर प्रदेश की पुलिस संगठित गुंडों का गिरोह है। टाटा ट्रस्ट्स द्वारा जारी ‘इंडिया जस्टिस रिपोर्ट’ शीर्षक से प्रकाशित शोध रिपोर्ट में यह खुलासा हुआ है की पीड़ितों को न्याय दिलाने के मामले में उत्तर प्रदेश पुलिस का प्रदर्शन सबसे खराब है। यही स्थिति उत्तर प्रदेश पुलिस की कार्य क्षमता और कार्य संस्कृति के मानक पर भी पाई गई है। पुलिस तंत्र में महिलाओं की तैनाती का आंकड़ा मात्र सात प्रतिशत है। हाल फिलहाल देश की सर्वोच्च अदालत ने उत्तर प्रदेश पुलिस को कड़ी फटकार लगाईं थी। सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस की कार्यशैली पर टिप्पणी करते हुए कहा था कि यूपी पुलिस पावर एंजॉय कर रही है। उसे संवेदनशील होने की जरूरत है।पुलिस की छवि थानों और पुलिस चौकियों पर तैनात पुलिस तंत्र की कार्य संस्कृति के आलोक में देखी जा सकती है। निचले स्तर पर तैनात थाना प्रभारी ,चौकी प्रभारी ,बीट वार तैनात दरोगा ,सिपाही की कार्य संस्कृति ,उन पर पुलिस तंत्र के आला अफसरानों का नियंत्रण तय करता है की पुलिस की छवि कैसी है ,उसके प्रति जनमानस की सोंच कैसी है ?जब यह लेख पोस्ट कर रहा हूँ मेरे मानस पटल पर चुनार दुर्ग के कमांडेंट रहे माहेश्वरी साहब का आमंत्रण उभर आया जिसकी चर्चा प्रासंगिक है। डीजी पुलिस ट्रेनिंग चमन लाल प्रद्योत चुनार दुर्ग आए थे उनके सम्मान में आयोजित डिनर का आमंत्रण देते हुए माहेश्वरी साहब ने मुझसे निवेदन किया था की डीजी पुलिस ट्रेनिंग चमन लाल प्रद्योत के मुख्य आतिथ्य में पुलिस नागरिक परस्पर सहयोग एवं समन्वय विषयक संगोष्ठी को सम्बोधित करने के लिए तय चार मंचीय अतिथियों में मैं भी शामिल हूँ। मेरे लम्बे सम्बोधन का एक अंश जो पुलिस के चाल चरित्र और चेहरे को आइना दिखाने के लिए मेरे सम्बोधन का हिस्सा था मुझे आज भी याद है। मैंने प्रद्योत साहब की तरफ मुखातिब होकर अपने सम्बोधन में कहा था पुलिस की आम छवि ऐसी है की किसी सभ्य नागरिक को यदि बीट दरोगा या सिपाही यह सूचित करे की कोतवाल साहब ने चाय पर बुलाया है तब सबसे पहले वह सभ्य नागरिक यह पता करता है की कोतवाल साहब का ख़ास कौन है ,किसकी उनसे पटती है ? ऐसे खास व्यक्ति को बता कर तब वह डरते डरते कोतवाल साहब की चाय पीने जाता है। मैंने कहा था जब तक यह छवि कायम रहेगी पुलिस नागरिक के बीच परस्पर सहयोग और समन्वय की कल्पना नहीं की जा सकती।
लगभग पांच दशक पूर्व इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस मुल्ला ने उत्तर प्रदेश पुलिस के लिए जो तल्ख़ टिप्पणी की थी वह आज भी प्रासंगिक है। आज भी पुलिस का भयावह चेहरा देख कर कोई भी व्यक्ति उसके पास मदद के लिये जाने में कतराता है।उत्तर प्रदेश के मीरजापुर जिले की चुनार थाने की कार्य संस्कृति को मैंने बहुत नजदीक से दो आपराधिक मामलों मे देखा है।इस थाने का राजेश राय नामक एक दारोगा अपराधियों का हम प्याला हम निवाला है ,वह बेख़ौफ़ होकर न्याय की उम्मीद लेकर थाने जाने वालों को हतोत्साहित करता है ,अपराधियों के साथ खड़ा होता है और न्याय पाने की उम्मीद मे थाने का चक्कर लगाते लगाते पीड़ित पक्ष हताश हो जाता है। स्वाभाविक तौर पर ऐसे पीड़ित पक्ष समाज के किसी ऐसे प्रतिष्ठित नागरिक का दरवाजा खटखटाते हैं जो उसकी बात न्याय दिलाने के लिए आला अफसरान तक पहूंचा सके।एक सड़क दुर्घटना (जो मेरी आंख के सामने हुई ) के मामले में यह दरोगा पीड़ित पक्ष को टहलाता रहा,शराब के नशे में धुत होकर व्यावसायिक वाहन चलाने ,आए दिन दुर्घटना करने ,दुर्घटना में घायलों से मारपीट ,गुंडागर्दी करने वाले को संरक्षण देता रहा। सूबे के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के सख्त दिशा निर्देशों के बावजूद पुलिस के चाल चरित्र चेहरे मे जमीन पर कोई अंतर नजर नहीं आता। चुनार थाने का दरोगा राजेश राय अपराधियों से गलबहियां करता है, सम्मानित नागरिकों को ज्ञान देता है की अपराधियों के खिलाफ नहीं बोलना चाहिए।यदि किसी
सभ्य नागरिक ने किसी पीड़ित को न्याय दिलाने के लिए हस्तक्षेप किया तब उसके चरित्र हनन की साजिश रचता है। इसके दुस्साहस का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है की अपने भाई ,भाभी और उनके पालित अराजक तत्व द्वारा प्रताड़ित एक पीड़िता को न्याय दिलाने के लिए कमिश्नर के हस्तक्षेप के बावजूद यह दरोगा पीड़िता से सुलहनामा लिखवा कर लीपापोती करता है। अपराधियों के साथ खड़ा होता है। पीड़िता ने जबरिया सुलहनामा लिखवाने की इसकी करतूत की जानकारी कमिश्नर को देकर बताया है की चुनार पुलिस का बीट दरोगा उसकी बात नहीं सुन रहा है, उसकी जान को उनसे ख़तरा है जिनके खिलाफ उसने चुनार कोतबाली के इन्स्पेक्टर को आवेदन दिया था ,सुनवाई न होने पर कमिश्नर को अपनी व्यथा से अवगत कराया था।
यह दो प्रकरण इस बात की पुष्टि करते हैं की पुलिसिया कार्यसंस्कृति पुलिस की छवि को धूमिल कर सूबे के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के उन दिशा निर्देशों की धज्जियां उड़ा रही है जो समय समय पर सूबे की कानून व्यवस्था कायम रखने के लिए वह देते हैं ।आवश्यकता है पुलिस की कार्यसंस्कृति को पीड़ितों को न्याय देने बाली बनाने के लिए पुलिस तंत्र में निचले स्तर पर आमूलचूल परिवर्तन हो और आला अफसरान निचले स्तर पर संवेदनशील ,जबाबदेह ढांचा खड़ा करें ताकि पुलिस की साख ,उसकी छवि को धूमिल करने की हिमाकत कोई राजेश राय जैसा बीट दरोगा न कर सके






